कैंट स्टेशन पर फर्स्ट एड की भी सुविधा नहीं

November 15, 2017, 12:20 PM
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साबरमती एक्सप्रेस से दो दिन पहले बनारस पहुंची गर्भवती महिला को कैंट रेलवे स्टेशन पर लगभग दो घंटे तक डॉक्टरी मदद के लिए तड़पना पड़ा। इस वाकये से आदर्श कहे जाने वाले कैंट स्टेशन की चिकित्सा सुविधा की हकीकत सामने आ गई है। दुर्भाग्य से कोई यात्री सफर के दौरान बीमार हो कैंट स्टेशन पहुंच जाए तो उसकी हालत और खराब हो सकती है। क्योंकि यहां समुचित चिकित्सा व्यवस्था दूर की बात, फर्स्ट एड की भी सुविधा नहीं है। जिस स्टेशन पर 60 से अधिक ट्रेनें आती हैं, तकरीबन डेढ़ लाख यात्रियों की आवाजाही है, वहां पेट दर्द की सामान्य दवा भी नहीं मिलती।

मंगलवार को तो बनारस से जाने वाली वीआईपी ट्रेनों में भी फर्स्ट एड की सुविधा नहीं दिखी। ट्रेन मैनेजर ने तर्क दिया कि रेल अफसर इस संबंध में कभी कुछ कहते ही नहीं। यहां स्टेशन पर ह्वील चेयर है लेकिन शायद ही कभी इसका मरीजों के लिए इस्तेमाल होता हो। स्ट्रेचर कभी-कभार काम आ जाता है। दर्द, बुखार, पेट दर्द की सामान्य दवा भी यहां ढूंढ़े नहीं मिलेंगी। स्टेशन परिसर में न तो दवा की कोई दुकान है और न ही कहीं डॉक्टर व उसके स्टॉफ के बैठने का इंतजाम। अगर  चिकित्सक या स्वास्थ्यकर्मी मौके पर होते तो सोमवार को साबरमती एक्सप्रेस से उतरी प्रसव पीड़िता को राहत मिल सकती थी। डिप्टी स्टेशन अधीक्षक (कामर्शियल) कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार रोज तीन से चार केस बीमार यात्रियों के आते हैं। उन्हें तत्काल इलाज की जरूरत होती है।

कागजी कोरम में निकल जाता है समय
अगर ट्रेन में कोई यात्री बीमार पड़ जाये तो इलाज बिना मेमो के शुरू नहीं होता। मेमो प्रक्रिया पूरा करने में करीब आधा घंटा लग जाता है। तब तक बीमार यात्री तड़पता रहता है। डिप्टी स्टेशन अधीक्षक (कामर्शियल) फईम खान का कहना है कि फोन से सूचना देने पर यहां कोई स्वास्थ्य कर्मी नहीं आता। मेमो की मांग की जाती है। कागजी प्रक्रिया पूरी करने में समय जाया होता है।

वहीं सीएमएस उषा किरण का कहना है कि फोन से आधी-अधूरी सूचना दी जाती है। डॉक्टर और कर्मचारी स्टेशन पर जाकर भटकते रहते हैं। वह कई बार बिना मेमो के यात्रियों का इलाज किया जाता है।

ट्रेनों में नहीं थी चिकित्सकीय व्यवस्था
मंगलवार को कैंट स्टेशन से मुम्बई जाने वाली कामायनी एक्सप्रेस और राजगीर से नई दिल्ली जा रही श्रमजीवी एक्सप्रेस में कोई चिकित्सकीय व्यवस्था नहीं दिखी। नियमत: गार्ड और पैंट्री कार मैनेजर के पास प्राथमिक उपचार की पेटी होनी चाहिए। श्रमजीवी एक्सप्रेस के मैनेजर अखिलेश सिंह ने बताया कि उनके यहां ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। ना ही रेल अफसर इसके लिए कभी कहते हैं। यही हाल कामायनी एक्सप्रेस का भी था।

न हेल्पलाइन नंबर, ना ही डिस्प्ले बोर्ड 
कैंट स्टेशन पर स्वास्थ्य संबंधी सहायता के लिए कोई हेल्पलाइन नंबर भी नहीं है। ना ही स्वास्थ्य संबंधी डिस्प्ले बोर्ड ही कहीं लगाया गया है।

एक डॉक्टर और दो फार्मासिस्ट के सहारे इलाज
कैंट स्टेशन के पास नार्दर्न रेलवे का अस्पताल एक चिकित्सक तथा दो फार्मासिस्ट के सहारे चल रहा है। सीएमएस उषा किरन के मुताबिक औसतन 75 मरीज रेलवे कॉलोनियों के आते हैं। करीब 25 रेलवे कर्मचारियों की मेडिकल भी रोज करनी होती है। इस दौरान बीमार यात्रियों की भी मदद की जाती है।

निजी डॉक्टरों की भी ले सकते हैं सेवा 
रेलवे चिकित्सक के न होने की स्थिति में बीमार यात्री के इलाज के लिए बाहर से भी चिकित्सक मुहैया कराये जा सकते हैं। इसके लिए डिप्टी स्टेशन अधीक्षक कामर्शियल कार्यालय में निजी चिकित्सकों की सूची लगी है। यहां डिप्टी स्टेशन अधीक्षक फईम खान बताते हैं कि अब तक किसी बाहरी चिकित्सक की मदद नहीं ली गई है।

Source-Live Hindustan

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