Nov 12, 2014

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IMPORTANT CLARIFICATION FROM RAILWAY BOARD REGARDING BONUS


Rising diesel bills and electrification delay trouble Konkan Railway



Electrification and having double tracks on Konkan Railway are the only way to get the ailing transporter out of the red

The money being wasted on diesel to operate the ever-increasing traffic on Konkan Railway (KR), thanks to red-tape delaying the electrification process of the single-line railway, is mind-boggling even by railway standards.

A recent KR study showed that if all the trains – passenger and goods – that KR had operated between April 2013 and March 2014, had been powered by electricity instead of diesel, KR would have saved Rs 134 crore on energy bill. It spent Rs 269 crore on diesel. That, the study showed, was a straight 50% reduction in energy bills for a transporter creaking with mounting losses.

Why is diesel bill going up?
The diesel bill, thanks to the number of special trains going up by the year apart from the routine ones, has been going up steadily. It was Rs 151 crore in 2011-12; went up to Rs 205 crore in 2012-13 and then to Rs 269 crore (2013-14). As per current estimates, by March 2015, the diesel bill could touch Rs 325 crore.

Why the delay in electrification?
This at a time when a KR proposal to electrify its Roha-Thokur stretch incurring Rs 720 crore is lying dormant with the railway board (since this January). Dna, in its Tuesday edition, had front-paged how electrification and doubling of KR is the only way to get the ailing transporter out of the red.
"The study further showed that the money spent of electrification – Rs 720 crore – could be recouped in five years. But still the proposal is stuck in red-tape, leaving one of the country's most congested and heavily-patronised routes in the red year after year," said a senior official.

Operational challenge
The delay in electrification could also throw up a major operational challenge for railways. Electrification work on Southern Railway's Shorannur-Mangalore route is expected to be completed by next March. The doubling of Panvel-Roha stretch is also expected to be completed by that time, and its electrification by 2017.
"That would mean electrification would have been completed on KR's either ends. It means trains will have to change locomotives, from electrical to diesel, before entering KR territory at both Roha on CR and Mangalore on SR. That will be one huge wastage of time and necessitates having both diesel and electric locomotives for every journey," said the official.
KR pins hope on...

According to officials, KR's saviour could be the new railway minister, Suresh Prabhu, who is from the Konkan belt and is well-acquainted with its problems.

Figures speak
2011-12: Rs 151cr.
2012-13: Rs 205cr.
2013-14: Rs 269cr.
2014-15: Rs 325cr (estimated).

Cost of electrification (estimated): Rs 720cr.
Recoup period (estimated): 5 years.
Time for electrification: 3 years.
SOURCE-DNA

रेलवे को नया बोर्ड नहीं निवेश चाहिए



बोर्ड की पुनर्रचना की बजाय नए रेल मंत्री को नेटवर्क विस्तार पर ध्यान देना चाहिए - विजय दत्त 

पिछले दिनों ऐसी खबरें आईं कि केंद्र सरकार रेलवे बोर्ड की पुनर्रचना करना चाहती है। ट्रेनों की रफ्तार बढ़ाने और उसे बुलेट ट्रेन युग में ले जाने की योजनाओं को देखते हुए केंद्र का यह प्रस्तावित कदम उसके अनुरूप ही लगता है पर क्या वाकई ऐसा है? क्या वाकई बोर्ड को नया स्वरूप देने की जरूरत है या इसकी परेशानियों का समाधान कहीं और है? इसके अलावा यह भी पता चला है कि रेलवे की 'पुनर्रचना' के लिए भी अर्थशास्त्री बिबेक देबराय की अध्यक्षता में समिति गठित की गई है। पूर्व कैबिनेट सचिव केएम चंद्रशेखर, पूर्व वित्त आयुक्त रेलवे राजेंद्र कश्यप, पूर्व सीएमडी पी एंड जी गुरचरन दास, एनएसई के पूर्व एमडी रवि नारायण और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के पार्थ मुखोपाध्याय इस समिति के अन्य सदस्य हैं। मुखोपाध्याय अर्थ मंत्रालय के मनोनीत सदस्य हैं। 
वर्तमान में बोर्ड की संरचना ऐसी है कि इसके चेयरमैन से लेकर बोर्ड के सदस्य तक सब अपने मामलों के विशेषज्ञ हैं। उन्हें जमीनी अनुभव है। ये ही लोग सबकुछ करते हैं। बोर्ड के नए स्वरूप में नीति निर्माण को संचालन से अलग करने का विचार है। अब रेवेन्यू स्ट्रक्टर लाया जा रहा है। इससे नौकरशाही का प्रभुत्व हो जाएगा, जो संचालन के काम को अच्छा काम नहीं मानती। नीति निर्माण को संचालन से अलग करना रेलवे को बहुत भारी पड़ सकता है। होता यह है कि किसी भी संरचनागत निर्णय का परिणाम आने में चार-पांच वर्ष लग जाते हैं। इतने समय में मंत्री महोदय का कार्यकाल ही पूरा हो जाता है। 
यह पहल चकित करने वाली है, क्योंकि यह एक ऐसी सरकार की ओर से रही है, जिसे प्रगतिशील और भविष्यदृष्टि रखने वाली सरकार समझा जाता है। रेलवे बोर्ड देश के चुनिंदा कामयाब संस्थाओं में से है, जिसने आंतरिक और बाह्य स्तर पर पिछले 150 वर्षों से ज्यादा की लंबी पारी में आमूल बदलावों को अंजाम दिया है। सब्सिडी के युग में मौजूदा संरचना वाले बोर्ड ने दुनिया में सबसे कम लागत पर श्रेष्ठतम सेवाएं दी हैं। इसके साथ इसने अधिकतम संभव आमदनी कमाकर भी दी है। इस समय रेलवे के लगभग सभी क्षेत्रों में काफी महत्वपूर्ण फेरबदल के साथ नई पहल की गई है। इसमें माल ढुलाई सुगम बनाने के उद्‌देश्य से समर्पित गलियारे के लिए डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉर्पोरेशन और यात्री सेवाओं के लिए हाई स्पीड नेटवर्क का नाम लिया जा सकता है। फिर काउंटर पर ग्राहकों को श्रेष्ठतम सेवाएं देने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कई सारी पहल की गई हैं। भारतीय रेलवे अत्यधिक महत्वपूर्ण संगठन है, जो देश को जोड़ने में असाधारण भूमिका निभा रहा है। 
दक्षिण में कन्याकुमारी से लेकर उत्तर में बारामूला और पश्चिम में द्वारका से लेकर पूर्व में लेडो तक भारतीय रेलें लोगों और सामग्रियों को लाने-ले जाने का काम कर रही हैं। वह तरक्की के अवसर पैदा कर रही है और विकास को प्रोत्साहन दे रही है। यह संगठन इस विशाल राष्ट्र की विकास आर्थिक वृद्धि की कहानी में अकेला सबसे महत्वपूर्ण उत्प्रेरक है। यह दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है, जिसमें 7,083 रेलवे स्टेशन, 1,31,205 रेलवे पुल, 9000 लोकोमोटिव, 51,030 यात्री कोच और 2,19,931 मालवाही डिब्बे हैं। अनुमान है कि भारतीय रेलें देश के सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) में डेढ़ से दो फीसदी का अतिरिक्त योगदान दे सकती हैं। 
रेलवे की एक और खासियत यह है कि सड़क परिवहन की तुलना में छह गुना कम ऊर्जा और एक-तिहाई जगह का इस्तेमाल करती है। फिलहाल जब कच्चे तेल के भारी आयात से चालू खाते का बढ़ता घाटा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बन चुका है, रेलवे का तीव्र विकास देश को एक आर्थिक मौका दे सकता है। देश के परिवहन मॉडल को माल ढुलाई और यात्री सेवा दोनों क्षेत्रों में सड़क से रेलवे पर लाकर कच्चे तेल के आयात पर होने वाले खर्च को न्यूनतम किया जा सकता है, इससे चालू खाते के संकट का समाधान मिल जाएगा, जिसकी तलाश में यह बिंदु आमतौर पर भुला दिया जाता है। वास्तवमें बोर्ड की पुनर्रचना की बजाय चुनौती तो मांग के अनुरूप नेटवर्क में वृद्धि करने की है और इसके लिए निवेश की जरूरत होगी। यह काम बोर्ड की मौजूदा संरचना में बखूबी अंजाम दिया जा सकता है। इसकी बजाय बोर्ड की संरचना से छेड़छाड़ से भारतीय रेलवे का हश्र एयर इंडिया और बीएसएनएल/एमटीएनएल जैसा हो सकता है। खास बात यह है कि जिस समिति का उल्लेख किया जा रहा है, उसमें रेलवे के केंद्रीय विभागों में से कोई नहीं है। केवल रेलवे फाइनेंस से एक विशेषज्ञ हैं, लेकिन उन्हें रेलवे के संचालन का कोई व्यावहारिक अनुभव नहीं हो सकता। हमें यह समझना होगा कि परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष विज्ञान की तरह रेलवे भी जटिल तकनीकी संगठन है। यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि रेलवे में समर्पित और ईमानदार अधिकारी कर्मचारी हैं। रेलवे के राजनीतिक नेतृत्व और अधिकारियों के भ्रष्टाचार के मामलों के कारण रेलकर्मियों ने देश को जो योगदान दिया है, उसके श्रेय से उन्हें वंचित नहीं किया जाना चाहिए। वास्तविकता तो यह है कि रेलवे की संरचना को परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष विज्ञान जैसे उच्च प्रौद्योगिकी वाले विभागों ने अपने यहां सफलता से लागू किया है। 
फिलहाल भारतीय रेलवे में कई महत्वपूर्ण पद रिक्त पड़े हैं। जब भारतीय रेलों को अत्यधिक रफ्तार के युग में ले जाने का निर्णय लिया गया तो बोर्ड में इलेक्ट्रिकल मेंबर का पद रिक्त था और अब तक है, जबकि इस अवधारणा को आगे ले जाने और व्यावहारिक रूप देेने के लिए यह महत्वपूर्ण पद है। इसी प्रकार जनरल मैनेजर के कई पद रिक्त हैं। अच्छे शासन का पहला सिद्धांत यह है कि लोगों को उनका वाजिब हक समय रहते उपलब्ध कराया जाए और देश को आगे ले जाएं। विलंब से भ्रष्ट व्यवहारों को बढ़ावा मिलता है, जैसा कि हम पूर्व में देख चुके हैं। 
अब रेल मंत्रालय को सुरेश प्रभु जैसा कुशल मंत्री मिला है, जिसने एनडीए में ऊर्जा मंत्री के रूप में असाधारण प्रशासनिक कुशलता दिखाकर प्रशंसा अर्जित की थी। एक पत्रिका ने तो तब उन्हें दूसरा सबसे कार्यकुशल मंत्री घोषित किया था। गौरतलब है कि पूर्व में रेल मंत्रालय क्षेत्रीय दिग्गजों के खाते में जाता रहा है, जो इसकी विशाल क्षमताओं का दुरुपयोग करते रहे हैं। इससे रेलवे को वह फायदा नहीं मिल सका, जो इसके हकदार हैं। प्रभु को बोर्ड की पुनर्रचना में वक्त ऊर्जा बर्बाद करने की बजाय नेटवर्क का विस्तार सुनिश्चित करना होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शासन में नए युग की शुरुआत की है। उन्हें रेलवे को भी अपनी भूमिका पूर्ववत निभाने देना चाहिए। राष्ट्र को उसे नेटवर्क विस्तार के लिए संसाधन देने चाहिए और क्रियान्वयन संगठन के मौजूदा स्वरूप पर ही छोड़ दिया जाना चाहिए। अन्यथा संगठन विवादों के समाधान में ही उलझ जाएगा और रेलवे के आधुनिकीकरण का मुख्य उद्‌देश्य हासिल नहीं हो पाएगा। 
Source-epaper.bhaskar
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Source-epaper.jagran

कोटा-उधमपुर साप्ताहिक हॉलीडे ट्रेन आज से होगी नियमित, समय भी बदला



कोटा. कोटा से उधमपुर के बीच चल रही हॉली-डे स्पेशल ट्रेन को 12 नवंबर से नियमित कर दिया गया है। ट्रेन कोटा से दोपहर ढाई बजे रवाना होगी। डीसीएम बाबूलाल मछया ने बताया कि बुधवार से ट्रेन की नई समय-सारणी लागू हो जाएगी। नए नंबरों के साथ कंप्यूटरीकृत आरक्षण पिछले महीने से शुरू कर दिया गया था। कोटा से उधमपुर जाने वाली ट्रेन का नया नंबर 19805 तथा उधमपुर से कोटा का नया नंबर 19806 हो जाएगा। ट्रेन कोटा से प्रत्येक बुधवार को दोपहर 2.30 बजे रवाना होकर दूसरे दिन गुरुवार को दोपहर 12.10 बजे उधमपुर पहुंचेगी। वापसी में प्रत्येक गुरुवार को दोपहर 2.35 बजे उधमपुर से रवाना होकर दूसरे दिन शुक्रवार को सुबह 11.15 बजे कोटा आएगी।

22 स्टेशनों पर रुकेगी

ठहराव: साप्ताहिक ट्रेन रास्ते में इन्द्रगढ़ सुमेरगंजमंडी, सवाईमाधोपुर, गंगापुरसिटी, हिण्डौन सिटी, बयाना, भरतपुर, मथुरा, फरीदाबाद, हजरत निजामुद्दीन, नई दिल्ली, सोनीपत, पानीपत, करनाल, कुरुक्षेत्र, अम्बाला, लुधियाना, जालंधर छावनी, पठानकोट छावनी, कठुआ, जम्मूतवी आदि 22 स्टेशनों पर रुकेगी। कुल सफर 1094 किमी का होगा।

बर्थ: ट्रेन में वातानुकूलित द्वितीय श्रेणी की 46 बर्थ, वातानुकूलित तृतीय श्रेणी की 128 बर्थ तथा स्लीपर श्रेणी की कुल 432 बर्थ की क्षमता है।

कोच: ट्रेन में कुल 17 कोच लगेंगे, जिसमें से दो कोच गार्ड-कम-ब्रेकवान, 6 कोच सामान्य द्वितीय श्रेणी, 6 कोच शयनयान , एक कोच वातानुकूलित द्वितीय श्रेणी तथा दो कोच वातानुकूलित तृतीय श्रेणी के रहेंगे।

आगरा-रतलाम ट्रेन अब 10 मिनट पहले होती है रवाना

आगरा-रतलाम पैसेंजर ट्रेन कोटा से अब 10 मिनट पहले रवाना होने लगी है। इस ट्रेन का समय यात्रियों को पता नहीं होने के कारण अब भी कई यात्री ट्रेन चूक जाते हैं। गाड़ी संख्या 59812 आगरा-नीमच पैसेंजर ट्रेन एक सितंबर के बाद से सुबह 5.45 बजे कोटा प्लेटफॉर्म पहुंचती है। ट्रेन को कोटा से सुबह 6.10 बजे रवाना किया जाता है।

पूर्व में यह ट्रेन कोटा से सुबह 6.20 बजे रवाना होती है। यानी अब ट्रेन पहले के समय से 10 मिनट पहले रवाना होती है। इस ट्रेन के रवाना होने के बाद चित्तौडगढ़ रूट से रतलाम जाने वाली कोई ट्रेन यात्रियों को नहीं मिल पाती है। शिवपुरा निवासी गोरधन लाल व मथुरालाल ने बताया कि ट्रेन के पूर्व समय के अनुसार स्टेशन पहुंचे तो पता लगा कि ट्रेन रवाना हो चुकी है।
Source-bhaskar

रेलवे की योजना | फाटकों पर दुर्घटना रोकने का प्रयास, लगाए जाएंगे रिपीट विसलिंग लेवल क्रॉसिंग बोर्ड 250 मीटर पहले से ड्राइवर बजाएगा हॉर्न

मानवरहित रेलवे फाटक पर होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए ट्रेन का इंजन लगातार हॉर्न देगा। रेलवे मानव रहित फाटकों से 250 मीटर की दूरी पर रिपिट विसलिंग रेलवे क्रासिंग बोर्ड लगा रहा है। इससे ट्रेन चालकों को 250 मीटर आगे फाटक होने का पता चल सकेगा और वह हॉर्न बजाता हुआ फाटक क्रॉस करेगा। 
अबभी हैं मानव रहित 1500 फाटक मौजूद 

उत्तर-पश्चिमरेलवे महाप्रबंधक ने दो दिन पहले ही ट्रेनों के दुर्घटना रहित होने का दावा किया था। हालांकि इस दावे को हकीकत का आईना खुद रेलवे के इंतजाम ही दिखा रहे हैं। हरियाणा-राजस्थान में बड़ी लाईन (ब्रॉडगेज) तथा छोटी लाईन (मीटर गेज) मिलाकर कुल 2500 क्रॉसिंग है, इनमें से 1500 फाटकों पर ही रेलकर्मी तैनात है। 1000 फाटक अब भी मानव रहित है। देश में इस साल अप्रैल से अक्टूबर तक 9 बड़े हादसे हो चुके हैं। पिछले तीन साल में 33 दुर्घटनाएं हुई हैं। रेलवे ने हादसों के चलते 3 साल में 275 मानव रहित क्रॉसिंग को स्थाई तौर पर बंद किया गया है। 

उत्तर-पश्चिम रेलवे के मुख्य संरक्षक अधिकारी अनुप कुमार ने बताया कि सामान्य तौर पर स्टेशन और फाटकों से 600 मीटर की दूरी पर एक संकेतक लगाया जाता है। अब फाटकों से 250 मीटर पहले ही रिपीट विसलिंग लेवल क्रॉसिंग बोर्ड लगाए जा रहे हैं। इस स्थान से लगातार सायरन बजाकर आस-पास के लोगों को ट्रेन निकलने तक क्रॉसिंग पार करने के लिए सावधान किया जाएगा। ये संकेतक रात के अंधेरे धुंध में भी गाड़ी चालकों को स्पष्ट नजर आएंगे। रेल मंत्रालय द्वारा मानव रहित रेलवे क्रॉसिंग फाटकों पर आए दिन होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए ये कदम उठाया जा रहा है। 

ऐसे मानव रहित फाटकों पर रेल की आवाज काफी नजदीक आने पर आती है। जिसके चलते विशेषकर सर्दी के मौसम में पड़ने वाली धुंध में वाहन राहगीर दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं। जयपुर डिवीजन के अनेक मानव रहित फाटकों पर पिछले दिनों इस तरह की दुर्घटनाएं घटित हो चुकी है। मानव रहित फाटक से 250 मीटर की दूरी पर ट्रेनों द्वारा लगातार हॉर्न देने से इन दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सकता है। 

Source-bhaskar

WR to scrap 3 long-distance train halts from Dec 1

Mumbai: Western Railway will eliminate halts at 17 stations, including three in Mumbai division (Bhadwad, Niyol and Lotarva), to reduce operating costs. 

Of the other halts, nine are in Vadodara division, three in Ahmedabad division and two in Rajkot division. 

WR's chief public relations officer Sharat Chandrayan said that no train would halt at those stations from December 1. Officials said the halts were provided at some of the stations due to political pressure. 

A senior railway official said not more than 50 tickets were sold per day at those stations, which was not remunerative. The railways claimed that the cost incurred per halt per station is Rs8,000 on account of fuel and operation costs of running the train and maintaining the station. However, the railways earned only Rs500 per stoppage from the loss-making halts. Apart from financial loss, the halts also affected the smooth running of trains. 

The official explained, "When a train halts, it blocks the path of trains that follow. The elimination of the halts will improve the line capacity, and allow the railways to run additional services." 

Indian Railways has identified around 1,240 stoppages across India that are unnecessary and unaffordable. 

A WR official said, "The railways has taken a series to steps to improve its financial health. It has raised fares, though not substantially, besides introducing innovative concepts like dynamic pricing in premium category trains as well as in the tatkal quota of some important trains." 

He said, "The railways has to stop wasteful expenditure to reduce its financial burden. The elimination of some halts is a small but significant step." 

The official said, "Halts which are not financially viable but socially important will not be touched." 

Dynamic pricing for 5 more trains

Central Railway has decided to introduce dynamic pricing in 50% of the tatkal quota in five more trains. The fare shall increase by 20% after each slab of 10% berths is sold subject to the existing cap (maximum fare chargeable) on dynamic fare. The trains are LTT-Coimbatore Express, LTT-Thiruvananthapuram Netravati Express, LTT-Gorakhpur Super Fast Express, LTT-Varanasi Super Fast Express and CST-Firozpur Punjab Mail.
Source-times of india

 

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