रेलवे में हुआ अरबों रुपए का अधिकारी पदोन्नति घोटाला – railsamachar.com

June 5, 2017, 3:18 PM [addtoany]

 रेलवे बोर्ड ने ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों के पदों में किया बंदरबांट

बिना कैबिनेट मंजूरी ग्रुप ‘ए’ के प्रमोटी कोटे को बढ़ाया गया

रेलवे बोर्ड द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवमानना की गई

संवैधानिक नियमों के साथ छेड़छाड़ करने का रेलवे बोर्ड पर आरोप

भारतीय रेलवे स्थापना नियमावली को वैधानिक नियम बताया गया

डीओपीटी के दिशा-निर्देशों को लागू करने में हुई पक्षपातपूर्ण साजिश

मृतप्राय एफआरओए को पदोन्नति घोटाले की तनिक भी भनक नहीं लगी

डीआईटीएस फिक्स करने और स्थाई जेएजी पैनल देने में हो सकती है देरी

रेलवे बोर्ड ने किया अधिकारी पदों में अरबों रुपए के रेल राजस्व का नुकसान

सुरेश त्रिपाठी

‘रेलवे समाचार’ द्वारा दि. 14.09.2016 को बहुत अनोखे और विसंगतिपूर्ण हैं रेलवे में पदोन्नति के नियम’, दि. 06.11.2016 को सरकारी आदेश की अवहेलना : रेलवे में अधिकारी पदों का घोटाला’, दि. 13.11.2016 कोपोस्ट बेस्ड रोस्टर : संवैधानिक आदेशों की अवहेलना’ और दि. 05.02.2017 को ‘एंटी डेटिंग सीनियरिटी को जारी रखना रेलवे को आर्थिक रूप से डुबाने वाला कदम’ शीर्षकों से रेलवे में अधिकारियों के पदों पर हुए भारी घपले के महत्वपूर्ण मुद्दे पर विस्तृत प्रकाश डाला गया था. अत्यंत विस्तार एवं तथ्यपूर्ण तरीके से प्रकाशित की गई उपरोक्त खबरों को ध्यान से पढ़ने और समझने के बजाय कुछ ‘मूढ़मति’ ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों ने ‘रेलवे समाचार’ को दोषी ठहराते हुए काफी भला-बुरा भी कहा.

हालांकि उनके शीर्ष संगठन ‘इरपोफ’ ने उक्त खबरों पर कोई खास प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, तथापि वह अब तक इस मुगालते में है कि उसके द्वारा रेलवे बोर्ड के तत्कालीन अधिकारियों के साथ मिलीभगत से किए गए पदोन्नति घोटाले की भनक किसी को नहीं है और वह सब ठीक कर लेगा. वह यही लालीपॉप अपने सभी जोनल संगठनों, उनके पदाधिकारियों और सर्वसामान्य ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों को भी दे रहा है, मगर वास्तविकता यह है कि वह भी इस घोटाले के उजागर होने और रेलवे बोर्ड द्वारा इसका संज्ञान लिए जाने से उद्विग्न है.

यह सर्वविदित है कि घोटालेबाज अपना रास्ता बड़ी ही चतुराई से बनाते हैं, परंतु रेलवे जैसा बड़ा तंत्र भी यदि उनके इस षड्यंत्र, साजिश और घपलेबाजी में शामिल हो जाए, तो देश के खजाने को लुटने से कोई रोक नहीं सकता है. रेलवे में पड़ी दिन-दहाड़े डकैती जैसा ही यह मामला है. रेल अधिकारियों से संबंधित ऐसा ही एक पदोन्नति घोटाला रेलवे में हुआ है, जो प्रत्येक वर्ष अरबों रुपए का रेल राजस्व डकार रहा है.

इस संबंध में रेलवे बोर्ड को अनेकों ज्ञापन दिए गए. अनेकों मामले कोर्ट में चल रहे हैं. वेतन आयोग ने भी इस पदोन्नति घोटाले पर रिपोर्ट मांगी है. संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने भी अनेकों बार डीपीसी करने से मना किया. डीओपीटी ने भी 50:50 अनुपात के उल्लंघन पर जवाब मांगा है. वित्त मंत्रालय ने भी रेलवे की कैडर रिस्ट्रक्चरिंग वाली फाइल को लौटा दिया है.

वर्ष 2003 के बाद से अब तक रेल सेवाओं की रिस्ट्रक्चरिंग नहीं हो पाई है, जबकि केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों को कैडर रिस्ट्रक्चरिंग प्रत्येक पांच वर्ष में एक बार करनी होती है. कैडर रिस्ट्रक्चरिंग नहीं होने की वजह से रेलवे में अधिकारियों के स्तर पर पदोन्नति थम सी गई है.

इसका सर्वाधिक नुकसान वरिष्ठ प्रशासनिक वेतनमान (एसएजी) और उच्च प्रशासनिक वेतनमान (एचएजी) के अधिकारियों को ही हुआ है. अब यह पदोन्नति घोटाला रेलवे बोर्ड के गले की फांस बन गया है, जो किसी भी समय मीडिया में उछलकर रेलवे पर भारी पड़ सकता है.

इस पूरे घटनाक्रम को क्रमवार समझने की कोशिश करते हैं, जो निम्न प्रकार से है-

(अ) रेलवे बोर्ड द्वारा ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों को फायदा पहुंचाने के चक्कर में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और डीओपीटी के दिशा-निर्देशों की लगातार अवमानना तथा अवहेलना की गई

1. वर्ष 1995 में रेलवे के एक मामले में एसएलपी (सी) के तहत दि. 20.01.1995 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक आदेश में कहा गया था कि सीधी भर्ती वाले ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों और विभागीय ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों के बीच तय कोटे को किसी भी स्थिति में बदला नहीं जा सकता. परंतु हाल में ही रेलवे बोर्ड ने एक सोची-समझी साजिश के तहत ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों के पदों की संख्या बढ़ा दी.

2. वर्ष 1997 में सुप्रीम कोर्ट नेआर. के. सभरवाल मामले परनिर्णय देते हुए रिजर्वेशन रोस्टर में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को वैकेंसी (रिक्तियों) की जगह पोस्टों (पदों) पर लागू करने का आदेश दिया था. इस पर डीओपीटी ने भी ओएम जारी किया. परंतु रेलवे बोर्ड ने ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों को लाभ देने के चक्कर में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को रिजर्वेशन के बदले सीधी भर्ती और ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों के बीच तय कोटे पर लागू कर ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों के लिए जेटीएस के हजारों पदों का सृजन एक ही झटके में कर डाला, जिससे रेलवे राजस्व को प्रतिवर्ष अरबों रुपए का नुकसान होने लगा है.

3. वर्ष 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने आर. एन. भटनागर मामले पर आदेश देते हुए कहा कि प्रति वर्ष रिक्त पदों की गणना की जाएगी तथा उक्त गणना के आधार पर ही भर्ती करने का इंडेंट भेजा जाएगा. डीओपीटी ने भी इस निर्णय को अपने ओएम के माध्यम से जारी किया. परंतु रेलवे ने इसे लागू नहीं किया. यदि यह नियम रेलवे पर लागू किए जाते, तो ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों के पदों की संख्या में पर्याप्त कमी आती और प्रतिवर्ष अरबों रुपए के रेल राजस्व की भारी बचत भी होती.

4. वर्ष 2001 में अटलबिहारी बाजपेई सरकार ने वित्त मंत्रालय की सलाह पर डीओपीटी के द्वारा ऑप्टिमाइजेशन के लिए ओएम जारी किया था. इसमें बताया गया था कि सरकार के वित्तीय बोझ को कम करने के लिए सभी मंत्रालयों के सभी कैडर में प्रतिवर्ष 2% की कमी की जाएगी. अर्थात प्रत्येक वर्ष 2% पद खत्म होते चले जाएंगे. परंतु रेलवे बोर्ड ने सरकार के वित्तीय बोझ को नजरअंदाज करते हुए सीधी भर्ती वाले ग्रुप ‘ए’ के पदों में भारी कमी करके अप्रत्यक्ष रुप से यह सभी पद ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों के कोटे में डाल दिया. इससे प्रमोटी ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों के कोटे में अप्रत्याशित इजाफा हुआ.

5. वर्ष 2005 से 2007 के बीच ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों के वार्षिक ग्रुप ‘ए’ कोटे को 180 से बढ़ाकर 411 कर दिया गया. इसके लिए सर्वप्रथम जूनियर टाइम स्केल (जेटीएस) के अनुपात को 3:1 से बढ़ाकर 4:1 कर दिया गया. इससे ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों का वार्षिक कोटा 180 से बढ़कर 255 हो गया. इसके बाद इस अनुपात को पुनः 3:1 कर दिया गया, जिससे दुबारा ग्रुप ‘बी’ प्रमोटी कोटा बढ़कर 318 हो गया और अंततः लीव रिजर्व के पदों को गलत तरीके से रिक्त दिखाकर उनको भी ग्रुप ‘बी’ कोटे में जोड़ दिया गया, जिससे ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों का वार्षिक कोटा बढ़कर 411 हो गया.

6. इस पूरे खेल में दो दिलचस्प बातें उभरकर आती हैं. पहली यह कि रेलवे बोर्ड के तत्कालीन अधिकारी ग्रुप ‘बी’ प्रमोटी कोटे में बढ़ोत्तरी करते समय ऑफिस नोट में यह लिखते हैं कि इंडियन रेलवे प्रमोटी ऑफिसर्स फेडरेशन (इरपोफ) की मांग पर ग्रुप ‘बी’ का कोटा बढ़ाया गया. अर्थात संपूर्ण रेलवे बोर्ड ने इरपोफ के सामने घुटने टेक दिए थे, जिससे सरकार द्वारा बनाए गए नियमों की अनदेखी हुई. दूसरी बात यह कि रेलवे के ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों की संख्या में बढ़ोतरी का अधिकार रेलवे के पास है कि नहीं? इसका जवाब डीओपीटी के वर्ष 1959 के ओएम में स्पष्ट रूप से दिया गया है कि केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों में ग्रुप ‘ए’ की संख्या, जिसके बढ़ने से सरकार के राजस्व पर बोझ पड़ता है, के लिए यूपीएससी, कार्मिक मंत्रालय (डीओपीटी) और वित्त मंत्रालय की सहमति लेना आवश्यक है. तत्पश्चात कैबिनेट की मंजूरी लेना भी जरूरी है.

7. रेलवे बोर्ड में मौजूद दस्तावेज तथा आरटीआई से प्राप्त जवाब भी यही कहते हैं कि रेलवे के ग्रुप ‘ए’ कैडर में किसी प्रकार की छेड़छाड़ अथवा कोई बदलाव (रिस्ट्रक्चरिंग) डीओपीटी और वित्त मंत्रालय तथा कैबिनेट की मंजूरी के बाद ही किया जा सकता है. इस रिस्ट्रक्चरिंग के माध्यम से सभी मंत्रालयों को कैबिनेट द्वारा मंजूरी दी जाती है कि ग्रुप ‘ए’ के जेटीएस, एसटीएस, जेएजी, एसजी, एचएजी और एचएजी+ स्तर पर पदों की संख्या कितनी-कितनी होगी. रेलवे में ग्रुप ‘ए’ की अंतिम कैडर रिस्ट्रक्चरिंग वर्ष 2003 से 2007 के बीच हुई थी. इसमें जेटीएस के पदों की संख्या में कोई बदलाव नहीं हुआ था. ऐसे में ग्रुप ‘बी’ प्रमोटी कोटे में जेटीएस के वार्षिक पदों को 180 से बढ़ाकर 411 कैसे किया गया?

8. इस बढ़ोतरी की मंजूरी के लिए इरपोफ और रेलवे बोर्ड के तत्कालीन अधिकारियों ने संभव है कि डीओपीटी के तत्कालीन अधिकारियों के साथ साठ-गांठ करके ऑफिस नोटिंग को वित्त मंत्रालय के पास भेज दिया हो और बजट न्यूट्रल दिखाकर बढ़े हुए पदों पर मंजूरी प्राप्त कर ली गई हो. अर्थात यूपीएससी से सीधी भर्ती वाले दो-तिहाई पदों को ग्रुप ‘बी’ प्रमोटी कोटे में जोड़कर वार्षिक प्रमोटी कोटा 180 से बढ़ाकर 411 कर दिया गया और बजट न्यूट्रल का दिखावा करके यह पूरा खेल रचा गया.

9. डीओपीटी का ऑप्टिमाइजेशन का नियम 2001 से 2009 के बीच तक लागू हुआ था. अर्थात 9×2%=18% (कुल ग्रुप ‘ए’ कैडर) के पदों को ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों के कोटे में जोड़ दिया गया और सरकार को गुमराह करने के लिए बजट न्यूट्रल का हवाला देते हुए बढ़े हुए कोटे पर डीपीसी करवाई जाती रही. इसकी पुष्टि रेलवे बोर्ड से आरटीआई के तहत प्राप्त दस्तावेजों से होती है, जिसमें बताया गया है कि रेलवे बोर्ड ने ऑप्टिमाइजेशन से सिर्फ सीधी भर्ती वाले कोटे में कमी की है तथा कुल कैडर में जो 18% कटौती की जानी थी, उसमें कोई कटौती नहीं की गई. अतः एक सुनियोजित एवं योजनाबद्ध तरीके से सरकार के नियमों को ताक पर रखकर ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों को अतिरिक्त ग्रुप ‘ए’ के पदों का लाभ दिया गया. ऐसा करना किसी भी मंत्रालय के लिए न सिर्फ अत्यंत अशोभनीय है, बल्कि दंडनीय भी है.

10. वर्ष 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने एन. आर. परमार मामले में निर्णय देते हुए यह कहा था कि सीधी भर्ती वाले तथा प्रमोटी के बीच परस्पर वरीयता, भर्ती/डीपीसी के लिए भेजी जाने वाली इंडेंट की तारीख के आधार पर तय की जाएगी. इस निर्णय पर आधारित ओएम, डीओपीटी ने भी जारी किया है. परंतु रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड) प्रमोटी अधिकारियों को लाभ पहुंचाने की वजह से उच्च अदालत और डीओपीटी के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं कर रहा है.

11. वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने एम. सुधाकर राव मामले मेंनिर्णय देते हुए कहा था कि पूर्व के सेवाकाल के आधार पर पदोन्नति के समय दी जाने वाली एंटी डेटिंग सीनियरिटी सर्वथा गलत है. संवैधानिक पीठ ने यह भी कहा था कि ऐसी व्यवस्था समानता के अधिकार के नियम के विरुद्ध है. संवैधानिक पीठ ने यह भी कहा था कि उसका यह निर्णय पूर्व में दिए गए सभी आदेशों पर सुपरसीड (अधिक्रमण) करेगा. इसी प्रकार यह आदेश रेलवे के ए. के. निगम मामले पर निर्गत आदेश पर भी सुपरसीड करेगा. परंतु ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों को अनावश्यक फायदा देने के चक्कर में रेल प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के इस निर्णय को आज करीब चार साल बाद भी लागू नहीं किया है.

उल्लेखनीय है कि ए. के. निगम का मामला रेलवे के आईआरपीएस कैडर से संबंधित था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने मुरलीधर मामले का हवाला देते हुए एंटी डेटिंग सीनियरिटी को सही माना था. परंतु एम. सुधाकर राव मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुरलीधर मामले में दिए गए निर्णय को वापस लेते हुए एंटी डेटिंग सीनियरिटी को अवैध करार दे दिया है. चूंकि एंटी डेटिंग का प्रभाव दो ग्रुपों पर पड़ता है, इसलिए वर्ष 2017 में डीआईटीएस फिक्स करने से पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा एम. सुधाकर राव मामले में दिए गए आदेश पर रेलवे बोर्ड को भारत के अटॉर्नी जनरल और कानून मंत्रालय से लिखित कानूनी सलाह लेनी चाहिए.

(ब) भारत सरकार (कार्य आवंटन) नियम, 1961 और भारतीय रेल स्थापना कोड (आईआरईसी) तथा भारतीय रेल स्थापना नियमावली (आईआरईएम)

भारत सरकार (कार्य आवंटन) नियम, 1961 द्वारा रेलवे की विशिष्ट कार्य-प्रणाली की वजह से सेवा संबंधी मामलों पर अन्य मंत्रालयों से रेलवे को अलग किया गया है. इस छूट की वजह से रेलवे ग्रुप ‘सी’ कर्मचारियों को ग्रेड पे 4200/- एवं 4600/- पर नियुक्त करती है. जबकि अन्य मंत्रालयों में 4200/- तथा इससे ऊपर ग्रेड पे पाने वाले कर्मचारी ग्रुप ‘बी’ राजपत्रित अधिकारी की श्रेणी में आते हैं. सरकार ने आईआरईसी के तहत रेलवे को ग्रुप ‘सी’ और ग्रुप ‘डी’ कर्मचारियों का पूर्णरूपेण नियंत्रण दिया है तथा आईआरईसी को संविधान के आर्टिकल 309 के तहत ‘वैधानिक स्थिति’ प्राप्त है, जिसमें बदलाव सिर्फ गजटेड नोटिफिकेशन से ही संभव है.

जबकि रेलवे का आईआरईएम, कार्यकारी निर्देशों (एग्जीक्यूटिव इंस्ट्रक्शंस) का संग्रह है, जिसमें दैनंदिन कार्यों के नियम रखे गए हैं. रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड) आईआरईएम के प्रोविजंस (प्रावधानों) में कभी-भी बदलाव कर सकता है. पूर्व के दो मामलों में सुप्रीम कोर्ट, आईआरईएम को वैधानिक मान्यता दिए जाने की मांग को खारिज चुका है. इस प्रकार रेलवे बोर्ड द्वारा आईआरईएम की नियमावली 324 को वैधानिक बताना न सिर्फ पूरी तरह पक्षपातपूर्ण है, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना एवं अवहेलना भी है.

(स) रेलवे बोर्ड द्वारा डीआईटीएस फिक्स करने और स्थाई जेएजी पैनल बनाने में हो सकती है देरी

रेलवे में हुए इस ‘अधिकारी पदोन्नति घोटाले’ पर विभिन्न अदालतों में लगभग 10 से अधिक मामले विचाराधीन हैं, जबकि आरटीआई के तहत रेलवे बोर्ड से अब तक प्राप्त हुए दस्तावेजों को समझने पर यह स्पष्ट दिखाई देता है कि अधिकारियों की पदोन्नति में बड़े पैमाने पर गड़बड़-घोटाला हुआ है. ऐसी स्थिति में पदोन्नति मामलों पर वर्तमान में रेलवे बोर्ड के अधिकारी काफी फूंक-फूंककर कदम बढ़ा रहे हैं. इरपोफ और रेलवे बोर्ड के तत्कालीन अधिकारियों की साठ-गांठ का खेल उजागर होने के बाद वर्तमान में रेलवे बोर्ड में पदस्थापित अधिकारी इस अत्यंत विवादित विषय में पड़ना नहीं चाहते हैं, क्योंकि अरबों रुपए का यह ‘अधिकारी पदोन्नति घोटाला’ किसी भी समय मीडिया में उछलकर रेलवे के लिए भयावह मुद्दा बन सकता है.

इसके परिणामस्वरूप रेलवे बोर्ड भी अदालतों के अंतिम आदेश तक इंतजार करना ही उचित समझ रहा है. वैसे भी पूर्व में डीपीसी करने और डीआईटीएस फिक्स करने में अनेकों बार देरी हुई है. उदाहरणस्वरूप वर्ष 2001 से 2003 के बीच लगातार तीन वर्षों तक कोई डीपीसी नहीं हुई थी. अर्थात रेलवे बोर्ड के लिए यही उचित होगा कि वह ‘देखो और इंतजार करो’ की रणनीति अपनाए. परंतु डीआईटीएस फिक्स करने और स्थाई जेएजी पैनल बनाने में देरी की वजह से सीधी भर्ती वाले ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों के साथ-साथ ग्रुप ‘बी’ अधिकारी भी गेहूं के साथ घुन की तरह पीसे जाएंगे. इसे ही कहते हैं अपनी ही चाल में खुद मात खा जाना, जो कि वर्तमान में इरपोफ के साथ एकदम सही चरितार्थ हो रहा है.

उल्लेखनीय है कि रेलवे में 8 संगठित सेवाओं की अंतिम कैडर रिस्ट्रक्चरिंग वर्ष 2003 से 2007 के बीच हुई थी, जिसमें जूनियर टाइम स्केल (जेटीएस) के पदों की कुल संख्या में कोई परिवर्तन नहीं किया गया था. परंतु तब सीनियर टाइम स्केल (एसटीएस) के लगभग 800 पद कम अथवा समाप्त कर दिए गए थे. यहां यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि एसटीएस के पदों में उक्त भारी कटौती इरपोफ की सहमति से हुई थी. परंतु इसका रहस्य आज तक किसी को पता नहीं है कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर एसटीएस के पदों में कटौती किए जाने का औचित्य और इसमें इरपोफ की सहमति का आधार क्या था? इस मुद्दे पर विभिन्न जोनल प्रमोटी संगठनों के पदाधिकारियों द्वारा जब-जब इरपोफ से सवाल किया गया, तब-तब उसने इसका कोई सीधा जवाब देने से कन्नी काटते हुए जेटीएस में बढ़े पदों के मुद्दे को हाईलाइट किया.

इसके साथ ही इरपोफ सहित इसके कुछ पूर्व विद्वान पदाधिकारियों ने यह भी भ्रम फैला रखा है कि जेटीएस के पदों को बढ़ाने के लिए कैबिनेट की मंजूरी नहीं लेनी पड़ती है. एक तरफ इरपोफ ने जेटीएस के वार्षिक प्रमोटी पदों को 180 से बढ़वाकर 411 करा लिया, दूसरी तरफ एसटीएस में लगभग 800 पदों को समाप्त किए जाने के खेल में रेल प्रशासन का साथ दिया. ऐसा करना शायद इरपोफ के वरिष्ठ पदाधिकारियों की सोची-समझी रणनीति हो सकती है, क्योंकि ऐसी व्यवस्था के तहत ग्रुप ‘बी’ प्रमोटी अधिकारियों के एसटीएस में जल्दी प्रमोशन न हो पाने पर संगठन और प्रमोटी अधिकारियों के बीच अपनी अहमियत बरकरार रखने की उनकी सुनियोजित योजना रही हो सकती है.

एसटीएस में पदोन्नति के मुद्दे पर ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों की चिंता बिलकुल जायज है. इसके लिए सभी ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों को एकजुट होकर इरपोफ से यह मांग करनी चाहिए कि यदि जेटीएस और एसटीएस में पदों को बढ़ाने के लिए कैबिनेट की मंजूरी नहीं लेनी पड़ती है, तो जिस तरह उसने जेटीएस में प्रमोटी पदों को भारी मात्रा में बढ़वा लिया था, उसी तरह रेलवे बोर्ड से आग्रह करके उसे एसटीएस के पदों को भी उसी मात्रा में बढ़वाना चाहिए. क्योंकि बहुत से ग्रुप ‘बी’ अधिकारी 10-12-15 वर्षों से भी अधिक समय से जेटीएस में कार्यरत हैं, फिर भी उन्हें एसटीएस में प्रमोशन नहीं मिल पा रहा है. इससे वे काफी हतोत्साहित और अवसादग्रस्त हैं. अतः इरपोफ को मीटिंग और कोर्ट केसेस के नाम पर धन उगाही के साथ-साथ एसटीएस में पदों को बढ़ाने का भी सफल प्रयास करना चाहिए, जिससे कि भारी स्टेग्नेशन से बचा जा सकेगा.

(द) इरपोफ और एफआरओए के उद्देश्य एवं कार्य-प्रणाली के बीच हैं बुनियादी विषमताएं

इंडियन रेलवे प्रमोटी ऑफिसर्स फेडरेशन (इरपोफ) हमेशा ग्रुप ‘बी’ प्रमोटी अधिकारियों के उत्थान के लिए तत्पर रहा है. फिर चाहे वह चालाकी से हो, या छलपूर्वक, अथवा किसी को प्रलोभन देकर, अर्थात इरपोफ ने हमेशा ग्रुप ‘बी’ प्रमोटी कैडर का भला ही चाहा है. विगत के दशक में जितने भी अवसर मिले हैं, इरपोफ ने उन सभी अवसरों का भरपूर इस्तेमाल ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों के विकास में किया है, जिसकी वजह से ग्रुप ‘बी’ कैडर आज ‘फर्श से अर्श’ पर पहुंच गया है. परंतु इरपोफ एक जगह फेल हो गया, वह यह कि भविष्य में उसका खेल उजागर न हो पाए, इसके लिए उसने पहले से कोई मजबूत प्लान नहीं बनाया. अर्थात तृष्णा उतनी ही रखनी चाहिए थी, जिसको आसानी से पचाया जा सके. परिणामस्वरूप ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों की आने वाली भावी पीढ़ियों का भविष्य उज्ज्वल नहीं दिख रहा है.

अब जहां तक बात फेडरेशन ऑफ रेलवे ऑफिसर्स एसोसिएशंस(एफआरओए) की है, तो इसके बारे में शायद यही कहना उचित होगा कि यह एक मृतप्राय अधिकारी संगठन बनकर रह गया है. एफआरओए को डीआरएम्स, जीएम्स और एचएजी+ इत्यादि उच्च स्तरीय पदों में अधिक दिलचस्पी है और यह अधिकारी संगठन उनके लिए ही कार्य करता है. संगठन के संचालक और पदाधिकारी काफी सीनियर होते हैं. इस वजह से युवा ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों की मजाल नहीं होती है कि वह उनके सामने अपनी किसी परिवेदना की बात कर सकें. अर्थात एफआरओए के सामने युवा ग्रुप ‘ए’ अधिकारी या तो सिर्फ गिड़गिड़ा सकता है, या फिर हाथ जोड़कर सिर्फ निवेदन ही कर सकता है. शायद यही वजह रही होगी कि उसकी नाक के नीचे अरबों रुपए का ‘अधिकारी पदोन्नति घोटाला’ होता रहा, उसके सदस्य अधिकारियों का हक मारा जाता रहा और तमाम प्रावधानों तथा नियमों की धज्जियां उड़ती रहीं, मगर वह मस्त सोता रहा.

किसी भी क्रियाशील संगठन का आदर्श यही हो सकता है कि उक्त संगठन के सभी कार्यकर्ता अथवा सदस्य एक समान हों तथा उन्हें बराबरी का दर्जा प्राप्त हो. लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्येक सदस्य या कार्यकर्ता को संगठन में समान अधिकार प्राप्त होता है. परंतु आजकल स्थिति यह है कि यदि कोई युवा अधिकारी नियमानुकूल अधिकार की बात करता है, तो उसे उद्दंड और कामचोर बताकर कठिन पोस्टिंग के साथ-साथ ट्रांसफर पर ट्रांसफर किया जाता है तथा एफआरओए मूकदर्शक बना रहता है. हालांकि एफआरओए युवा ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों से मंथली कंट्रीब्यूशन लेकर उनको मानसिक रूप से संगठन में मौजूद होने का एहसास दिलाता रहता है. युवा ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों के अनुसार अन्य मंत्रालयों में मौजूद अधिकारी संगठनों की तुलना में एफआरओए एक चेतनाविहीन और दिशाहीन संगठन बनकर रह गया है.

अंत में ‘रेलवे समाचार’ का इस पूरे मामले पर यही मानना है कि आज नहीं तो कल, अदालतों को अपना निर्णय देना ही है. परंतु इरपोफ को अपने भ्रम दूर करके प्लान ‘बी’ या प्लान ‘सी’ पर ध्यान देने की जरूरत है, अन्यथा उसका दशकों का संघर्ष और मेहनत एक झटके में मिट्टी में मिल जाएगी. झांसी में 20 अप्रैल 2017 को संपन्न हुई कार्यकारिणी की बैठक (ईसीएम) में इस बात पर बार-बार जोर दिया गया कि ‘अदालत की नजर में हम लोग सही हैं और जीत हमें ही मिलेगी.’ यदि एक प्रतिशत भी यह मान लिया जाए कि अगर अदालत का निर्णय इरपोफ या ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों के विपरीत गया, तो उनकी वर्षों-वर्षों की मेहनत ठीक उसी तरह एक ही बार में स्वाहा हो जाएगी, जैसे पेशवाओं का हाल पानीपत की लड़ाई में हुआ था.

इसीलिए इरपोफ को कोई प्लान ‘बी’ या प्लान ‘सी’ भी सोचकर रखना होगा. इसके अलावा ‘प्रलय’ आने से पहले क्या यह अच्छा नहीं होगा कि मिल-बैठकर इस पूरे पदोन्नति घोटाले के मुद्दे को सुलझा लिया जाए! वैसे भी यूपीए-1 के समय लालू प्रसाद यादव ही रेलमंत्री थे और मौजूद दस्तावेज भी यही कहते हैं कि नियमों में बदलाव या साजिश का यह सारा गड़बड़झाला लालू प्रसाद यादव के ही कार्यकाल में हुआ था. इसलिए इस पदोन्नति घोटाले का मसला यदि ऊपर के मंचों पर उछलता है, तो रेलवे बोर्ड के तत्कालीन अधिकारियों के साथ-साथ वर्तमान एवं भावी ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों के भविष्य पर भी इसका अत्यंत बुरा प्रभाव पड़ने वाला है. जहां तक संगठन की बात है, तो इसका जितना नुकसान विगत 10-12 वर्षों में हुआ है, उतना शायद कभी नहीं हुआ था. दिग्भ्रम की स्थिति में पहुंच गए इस जीवंत संगठन को बचाने के लिए युवा ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों को अब आगे आना होगा.

एफआरओए के लिए भी ‘रेलवे समाचार’ का यही सुझाव है कि वह अपने कार्य-कलापों एवं सांगठनिक गतिविधियों को पारदर्शी बनाने के साथ-साथ यह सभी की पहुंच में होना चाहिए. अधिक से अधिक जागरूक युवा ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों को जोड़कर संगठन को मजबूत बनाने की कोशिश की जानी चाहिए, अन्यथा कुंठित, बदहवास, अवसादग्रस्त युवा ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों ने यदि मंथली कंट्रीब्यूशन देने से मना कर दिया, तो एफआरओए को अपना ऑफिस चलाने तक के लाले पड़ जाएंगे. इसलिए एफआरओए को क्रियाशील होकर मोदी सरकार के ‘सबका साथ, सबका विकास’ की तर्ज पर ‘युवा और अग्रज अधिकारियों का साथ-साथ विकास’ जैसे नारे को सार्थक बनाने का प्रयास करना चाहिए.

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